नई दिल्ली.दुनिया इस समय ऐसी भीषण गर्मी (Scorching heat) की चपेट में है और इससे राहत की भी कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। साल 2024 में 100 सालों की गर्मी का रिकॉर्ड टूटा। धरती का तापमान (Temprature rise of Earth) लगातार बढ़ रहा है और कई देशों में गर्मी से हालात बेहद गंभीर होते जा रहे हैं।
हवा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का स्तर 420 ppm तक पहुंच गया है। यह रिकॉर्ड भी ऐतिहासिक है। इसका असर सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बल्कि समुद्रों पर भी दिख रहा है। महासागर का पानी भी तेजी से गर्म हो रहा है। अमेरिका की डेथ वैली, कुवैत और भारत जैसे कई इलाकों में तापमान 52°C से 56°C तक पहुंच चुका है। इतनी गर्मी इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। हर साल लाखों लोग हीटवेव की चलते जान गंवा रहे हैं। जानिए, क्यों आखिर लू के दिनों में लगातार इजाफा होता जा रहा है?
चार गुना तेज हुई हीटवेव, बढ़ा खतरा
पिछले कुछ सालों में हर साल गर्मी नए-नए रिकॉर्ड बना रही है। पहले किसी साल तापमान में ज्यादा बढ़ोतरी देखी जाती है, लेकिन अब इसमें हर साल वृद्धि दर्ज की जा रही है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum ) और earth org के रिसर्च अनुसार साल 1924 के तुलना में धरती का औसत तापमान करीब 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बहुत बड़ा बदलाव है। सिर्फ 1.5 डिग्री बढ़ने से भी मौसम का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है। तेज गर्मी, लंबे सूखे, अचानक बारिश, बाढ़ और हीटवेव जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं। इस 21 सदी में तापमान बढ़ने की रफ्तार पिछली सदी के मुकाबले चार गुणा ज्यादा तेज हो गई है। धरती पहले से कहीं तेजी से गर्म हो रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हैं ग्रीनहाउस गैसें। मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और खासतौर पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) हवा में लगातार बढ़ रही हैं। ये गैसें धरती के ऊपर एक परत की तरह काम करती हैं, जो सूरज की गर्मी को बाहर निकलने नहीं देती। यही वजह है कि धरती हर साल और ज्यादा तपती जा रही है।
बढ़ती गर्मी के पीछे इंसान भी जिम्मेदार
ग्लोबल वार्मिंग के पीछे कोई रहस्यमयी वजह नहीं है, बल्कि इसमें इंसानों की गतिविधियों का बड़ा योगदान है। कुल प्रदूषण का करीब 55.4% हिस्सा हमारी वजह से पैदा होता है।
तेजी से बढ़ते शहरों में पेड़- पौधों की जगह कंक्रीट की इमारतें और सड़कें बन गई हैं। इससे शहर ज्यादा गर्म हो रहे हैं। इसे हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है।
फैक्ट्रियों और बड़े उद्योगों से निकलने वाला धुआं हवा को प्रदूषित कर रहा है। इससे वातावरण में गर्मी बढ़ाने वाली गैसें लगातार बढ़ रही हैं।
पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर हवा को साफ रखते हैं। लेकिन लगातार जंगल कटने से धरती का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है और गर्मी तेजी से बढ़ रही है।
दुनिया में अब तक दर्ज किए गए सबसे ज्यादा तापमान के आंकड़े
दुनिया में अब तक दर्ज किए गए सबसे ज्यादा तापमान के आंकड़े
रैंक देश दर्ज अधिकतम तापमान
1 अमेरिका (डेथ वैली) 56.7°C (विश्व रिकॉर्ड)
2 कुवैत 54°C
3 इराक 53.9°C
4 ईरान 53.7°C
5 पाकिस्तान 53.5°C
6 सऊदी अरब 52°C+
7 भारत 52°C+
8 अल्जीरिया 51°C
समंदर भी तेजी से हो रहे हैं गर्म
ज्यादातर लोगों का ध्यान केवल हवा में बढ़ रही गर्मी पर जाता है, क्योंकि हमारी त्वचा इसके संपर्क में हमेशा रहती है। हालांकि बड़ा खतरा समुद्रों के बढ़ रहे तापमान से भी पैदा हो रहा है। धरती पर पैदा होने वाली अतिरिक्त गर्मी का करीब 90% हिस्सा महासागर अपने अंदर सोख लेते हैं। समुद्र लगातार गर्म हो रहे हैं। इसका असर समुद्री जीवों, मौसम और पूरी धरती के संतुलन पर पड़ रहा है। समुद्र की ऊपर से नीचे 2,000 मीटर की गहराई तक पानी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। साल 2024 महासागरों के लिए भी अब तक का सबसे गर्म साल दर्ज किया गया। इसका असर दिखाई दे रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और दुनिया में बर्फीले पहाड़ों की चोटियां गंजी होती जा रही हैं। हिमालय के बड़े हिस्से में ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। हिमालय में बारिश कम होती जा रही है। वहीं समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और आने वाले समय में तटीय शहरों पर बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है।
छोटे जीवों पर भी बढ़ता खतरा
समुद्र में फाइटोप्लांकटन नाम के बेहद छोटे जीव होते हैं। ये धरती के लिए बहुत जरूरी हैं। ये ऑक्सीजन बनाने में मदद करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को भी सोखते हैं। लेकिन समुद्र में बढ़ते प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक ने इनके जीवन पर खतरा खड़ा कर दिया है। गंदगी और प्रदूषण की वजह से ये छोटे जीव तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। अगर इनकी संख्या कम होती गई, तो समुद्र की कार्बन सोखने की ताकत भी कमजोर पड़ जाएगी, जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा और बढ़ सकता है।
आर्कटिक से ग्लेशियर तक, तेजी से पिघल रही बर्फ
दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में आर्कटिक इलाका चार गुणा ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। इसका असर वहां की बर्फ पर साफ दिखाई दे रहा है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। पुरानी बर्फ की परतों की जांच में पाया गया कि आज कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बढ़ने की रफ्तार प्राकृतिक बदलावों के मुकाबले करीब 250 गुना ज्यादा तेज है। जलवायु परिवर्तन अब पहले की तुलना में अधिक तेज गति से हो रही है।





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