क्या बदलाव की मांग को अनदेखा किया जा सकता है
नई दिल्ली। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में एक बार फिर व्यापक अशांति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्र की राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक समस्याएं अब केवल असंतोष तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुकी हैं। हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों, इंटरनेट सेवाओं के निलंबन, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों तथा अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की मांग ने यह संकेत दिया है कि हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।
7 जून 2026 की हिंसा में कई लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। सरकार और प्रदर्शनकारियों के अपने-अपने दावे हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन द्वारा बल प्रयोग की बजाय संवाद और विश्वास बहाली को प्राथमिकता देना अधिक प्रभावी कदम हो सकता था।
वर्तमान आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसकी प्रकृति पहले की तुलना में बदल चुकी है। शुरुआत में बिजली की बढ़ती दरों, महंगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे आर्थिक मुद्दे आंदोलन का आधार थे, लेकिन अब यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय स्वायत्तता और इस्लामाबाद के प्रभाव को लेकर व्यापक बहस का विषय बन गया है। संयुक्त अवामी कार्रवाई समिति (जेएएसी) द्वारा विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग इसी राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति है।
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन आरक्षित सीटों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने की पुष्टि के बाद प्रदर्शनकारियों को यह महसूस हुआ कि उनकी राजनीतिक मांगों का संवैधानिक समाधान फिलहाल संभव नहीं है। परिणामस्वरूप आंदोलन और अधिक तीखा हो गया। यह स्थिति बताती है कि केवल कानूनी निर्णय पर्याप्त नहीं होते, बल्कि राजनीतिक सहमति और जनविश्वास भी उतने ही आवश्यक होते हैं।
सितंबर और अक्टूबर 2025 के आंदोलन के बाद सरकार और जेएएसी के बीच हुए समझौते में मुआवजा, आर्थिक राहत, शासन सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे अनेक वादे किए गए थे। हालांकि सरकार का दावा है कि अधिकांश मांगें पूरी कर दी गईं, लेकिन आंदोलनकारी इससे सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि विरोध प्रदर्शन फिर से तेज हो गए हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि यदि समझौतों का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन न हो, तो वे स्थायी समाधान नहीं बन पाते।
पीओजेके में दशकों से स्वायत्तता, संसाधनों के वितरण, प्रशासनिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर समय-समय पर असंतोष उभरता रहा है। क्षेत्र को भले ही “आज़ाद” कश्मीर के रूप में प्रस्तुत किया जाता हो, लेकिन स्थानीय नागरिकों के एक बड़े वर्ग का आरोप है कि महत्वपूर्ण निर्णयों पर इस्लामाबाद का अत्यधिक नियंत्रण बना हुआ है। यही धारणा आज जनाक्रोश का प्रमुख कारण बनती दिखाई दे रही है। आगामी 27 जुलाई 2026 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए स्थिति और संवेदनशील हो सकती है। यदि सरकार केवल प्रतिबंध, गिरफ्तारियों और सुरक्षा बलों के सहारे हालात नियंत्रित करने का प्रयास करती है, तो इससे असंतोष और गहरा सकता है। दूसरी ओर, यदि प्रदर्शनकारी भी हिंसा का रास्ता अपनाते हैं तो इसका सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को ही उठाना पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। ब्रिटिश सांसदों सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय समूहों ने मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई है। हालांकि पाकिस्तान ने इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए आलोचनाओं को खारिज किया है, लेकिन लगातार बढ़ती अंतरराष्ट्रीय निगरानी यह संकेत देती है कि यह मुद्दा अब केवल स्थानीय नहीं रह गया है।
स्पष्ट है कि पीओजेके में मौजूदा संकट केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और सुशासन की चुनौती भी है। यदि सरकार जनता की वास्तविक शिकायतों का समाधान संवाद, पारदर्शिता और ठोस सुधारों के माध्यम से नहीं करती, तो विरोध और दमन का यह चक्र भविष्य में और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। स्थायी शांति का मार्ग केवल लोकतांत्रिक संवाद, जवाबदेही और जनभावनाओं के सम्मान से ही निकल सकता है।
लेखक: अजीत कुमार सिंह
संघर्ष प्रबंधन संस्थान में वरिष्ठ फेलो :::






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