August 18, 2026 4:53 pm

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थानेश्वर मंदिर में मानस संगोष्ठी में संतों ने किया गुरु महिमा का गहन मंथन

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थानेश्वर मंदिर में रामचरितमानस मानस पर संगोष्ठी


पिथौरा। थानेश्वर महादेव मंदिर में सावन महोत्सव अंतर्गत धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में रामचरितमानस पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें तुलसीकृत रामचरितमानस के बालकाण्ड से प्रथम दोहे पर केंद्रित संगोष्ठी की शुरुआत मानस प्रवचनकार दिनेश दीक्षित ने की। जबकि भगवताचार्य पंडित दयालु महराज और देवराज मिश्रा ने  गोष्ठी में शिरकत करते हुए तुलसी के मानस की प्रासंगिकता और आध्यात्मिक जीवन में गुरु की महत्ता पर व्याख्यान दिया।
जिला मानस संगठन के जिला स्तरीय इस आयोजन में जिलेभर से रामायण मंडलियां और प्रवचनकार जुटे। जिला अध्यक्ष परमेश्वर डडसेना ने स्वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने घोषणा की कि इस कार्यक्रम को रामायण प्रेमियों से जो प्रतिसाद मिला उससे मानस संगठन उत्साहित है। और इस तरह की संगोष्ठी प्रतिमाह आयोजित की जाएगी।
संगोष्ठी में चर्चा का विषय बालकाण्ड का प्रथम दोहा था। जिसकी व्याख्या करते हुए मानस प्रवचनकार दिनेश दीक्षित ने कहा कि इसमें तुलसीदास ने गुरु की वंदना करते हुए उनकी महिमा का गुणगान किया है। उन्होंने बताया कि जिस तरह शरीर के सुचारु संचालन के लिए वात, कफ़, पित्त का संतुलन जरूरी है। उसी तरह आध्यात्म में विकारों पर नियंत्रण व उनका संतुलन जरूरी है, इनके असंतुलन से खतरा हो सकता है। गुरु के चरण कमलों के पराग की तरह सरसता होती है।
बागबाहरा क्षेत्र में प्रसिद्ध भागवताचार्य पंडित दयालु महराज ने कहा कि मति में शुद्धि लाने वाला ही सदगुरु होता है जो व्यक्ति के जीवन को दिशा ओर दृष्टि दोनों प्रदान करता है। गुरुकृपा से ही तुलसीदास रामचरितमानस जैसे ग्रंथ के रचयिता बने। जिसे उन्होंने  “स्वान्त: सुखाय” लिखा, किंतु उनकी यह अनमोल रचना समग्र विश्व के कल्याण का माध्यम बनी है। इसलिए इस महान ग्रंथ की शुरुआत में तुलसी ने गुरु की वंदना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया है।
सावित्रीपुर के भागवताचार्य पंडित देवराज मिश्रा ने कहा कि सृष्टि की सर्वाधिक तीव्र आध्यात्मिक और दिव्य शक्ति साकार रूप में गुरु में समाहित होती है गुरुकृपा चार प्रकार से प्राप्त होती है – दृश्यकृपा, स्मरणकृपा, शब्द कृपा और स्पर्शकृपा। उन्होंने चारों को सोदाहरण समझाया। पंडित मिश्रा ने कहा कि तुलसी ने रामचरितमानस को समाधिस्थ भाषा मे रचना की है। जो प्रासादिक ग्रन्थ है। आश्रय यह है कि इस पुण्य ग्रन्थ को देख लिया, रख लिया, स्पर्श किया हर स्थिति मै आप पुण्य अर्जित करते है।
तेंदुकोना के भागवताचार्य पंडित भागीरथी दुबे ने विषय की प्रासंगिकता ओर उसकी आध्यात्मिकता पर चर्चा करते हुए संगोष्ठी के लिए विचारणीय बिंदुओं पर ध्यान आकृष्ट किया। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन उमेश दीक्षित ने किया। कार्यक्रम में पंडित कृष्णकुमार शर्मा, अनूप दीक्षित, मनोहर साहू,सतीश शर्मा, श्यामलाल पटेल, चंद्रशेखर नायडू, परमेश्वर डडसेना, मनीराम नायक, जयकुमार पैंकरा, मेवालाल दुबे, कमल शर्मा, बुद्धेश्वर डडसेना, नोहरदास साहू, सीताराम चौधरी,सहित महासमुंद, बागबाहरा, बसना, सरायपाली से आये मानस प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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Author: live36garh

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